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ईद-उल-फितर जिले भर में हर्षौल्लास के साथ मनाई गयी
पूरे महीने रमजान मैं रोज़ा रखने के बाद ईद की पूर्व संध्या पर चांद दिखते ही मुस्लिम सम्प्रदाय के लोगों में खुशी छा गयी. नगर में जगह-जगह आतिशबाजी कर खुशी का इजहार किया गया.लोगों ने नमाज़ अदा कि और निकल पड़े बाज़ारों मैं ईद की खरीददारी करने. जौनपुर की बाज़ारों मैं रौनक देखते ही बनती थी.
ईद के चांद ने वातावरण को एक नए रूप मे खुशगवार बना दिया . चांद देखते ही लोगों के बीच फ़ितरे की बातें होने लगीं. फ़ितरा उस धार्मिक कर को कहते हैं जो प्रत्येक मुस्लिम परिवार के मुखिया को अपने परिवार के प्रत्येक सदस्य की ओर से निर्धनों को देना होता है. रमज़ान में चरित्र और शिष्टाचार का प्रशिक्षण लिए हुए लोग इस अवसर पर फ़ितरा देने और अपने दरिद्र भाइयों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं.
जहाँ रोजेदारों ने रोज़े रख के अपने जौनपुर मैं अमन और चैन की दुआएँ मांगी ,हिन्दू और मुसलमानों ने मिल के इफ्तारी के आयोजन किये गए वहीं अब इंतज़ार था ईद की सुबह का नमाज़ पढने और उसके बाद एक दूसरे से गले मिलने का शुभ अवसर प्राप्त करने का.
बच्चों की ईद इसलिए सबसे निराली होती है क्योंकि उन्हें नए-नए कपड़े पहनने और बड़ों से ईदी लेने की जल्दी होती है. बच्चे, चांद देख कर बड़ों को सलाम करते ही यह पूछने में लग जाते हैं कि रात कब कटेगी और मेहमान कब आना शुरू करेंगे. महिलाओं की ईद उनकी ज़िम्मेदारियां बढ़ा देती है. एक ओर सिवइयां और रंग-बिरंगे खाने तैयार करना तो दूसरी ओर उत्साह भरे बच्चों को नियंत्रित करना. इस प्रकार ईद विभिन्न विषयों और विभिन्न रंगों के साथ आती और लोगों को नए जीवन के लिए प्रेरित करती है.
शब्दकोष में ईद का अर्थ है लौटना और फ़ित्र का अर्थ है प्रवृत्ति.इस प्रकार ईदे फ़ित्र के विभिन्न अर्थों में से एक अर्थ, मानव प्रवृत्ति की ओर लौटना है. अब प्रश्न यह उठता है कि इस दिन को ईदेफ़ित्र क्यों कहा गया है? वास्वतविक्ता यह है कि मनुष्य अपनी अज्ञानता और लापरवाही के कारण धीरे-धीरे वास्तविक्ता और सच्चाई से दूर होता जाता है. वह स्वयं को भूलने लगता है और अपनी प्रवृत्ति को खो देता है. मनुष्य की यह उपेक्षा और असावधानी ईश्वर से उसके संबन्ध को समाप्त कर देती है. रमज़ान जैसे अवसर मनुष्य को जागृत करते और उसके मन तथा आत्मा पर जमी पापों की धूल को झाड़ देते हैं. इस स्थिति में मनुष्य अपनी प्रवृत्ति की ओर लौट सकता है और अपने मन को इस प्रकार पवित्र बना सकता है कि वह पुनः सत्य के प्रकाश को प्रतिबिंबित करने लगे.
यदि मनुष्य इस सीमा तक परिपूर्णता तक पहुंच जाए तो इसका अर्थ यह है कि अब उसमे ईदे फ़ित्र को समझने की योग्यता उत्पन्न हो गई है. इसीलिए कहा जाता है कि एक महीने तक रोज़े रखने के पश्चात मनुष्य इतना परिवर्तित हो जाता है कि जैसे उसने पुनः जन्म लिया हो. यही कारण है कि अपनी भौतिक इच्छाओं पर सफलता के दिन वह उत्सव मनाता है.
आज बुधवार ३१ अगस्त २०११ को जौनपुर के शाही ईदगाह और सदर इमामबारा बेगम गंज मैं ईद की नमाज़ मुसलमानों ने अदा की और एक दूसरे से गले मिल के मुबारकबाद दी. और नमाज़ के बाद शुरू हुआ एक दूसरे के घर पे जाना बधाई देना और सेवइयां खाना. जौनपुर मैं हिन्दू और मुसलमान मिल के यह त्यौहार मनाया करते हैं और एक दूसरे को बधाई देते हैं.
बलजोर राम प्रजापति स्मृति समाज सेवा संस्था द्वारा गुरुवार को नगर में ईद मिलन समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें विभिन्न जाति सम्प्रदाय के लोगों ने एक दूसरे को गले लगाकर ईद की मुबारकबाद दी। इस मौके पर एसोसिएट प्रोफेसर रवि प्रकाश, भूपेन्द्र पाल, रजनीश भाष्कर, डा.राकेश सोनकर, डा.मेराज अहमद, आदित्य प्रकाश, अशोक तिवारी, तिलकधारी यादव, डा.मंगला प्रकाश, सुहासिनी, नितान्त आदि मौजूद रहे।
ईदे फ़ित्र का दिन रोज़े रखने का पुरूस्कार है अतः मनुष्य को चाहिए कि वह इस दिन अपने लिए अपने समाज, देश तथा अन्य लोगों के लिए बहुत अधिक दुआ करे और ईश्वर से लोक-परलोक की भलाइयां मांगे.
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